1.4 राजनीतिक समाजशास्त्र का उद्भव और विकास
राजनीतिक समाजशास्त्र का विकास रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि यह राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के बीच की दूरी को पाटने के प्रयास के रूप में उभरा। इसके विकास की अवधारणा को हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. उद्भव की पृष्ठभूमि (Origin)
- बौद्धिक जड़ें: इसकी शुरुआत 19वीं सदी के विचारकों जैसे कार्ल मार्क्स, मैक्स वेबर और एमिल डरखाइम के विचारों से हुई, जिन्होंने समाज और सत्ता के संबंधों को नए नजरिए से देखा।
- पारंपरिक राजनीति विज्ञान की सीमा: पारंपरिक राजनीति विज्ञान केवल राज्य और कानूनी संस्थाओं तक सीमित था। समाजशास्त्रियों ने महसूस किया कि राजनीति को समझने के लिए सामाजिक संरचनाओं को समझना जरूरी है।
2. विकास के प्रमुख चरण (Stages of Development)
क. शास्त्रीय चरण (Classical Stage): इसमें मार्क्स का 'वर्ग संघर्ष' और वेबर का 'शक्ति एवं नौकरशाही' का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण था। इन्होंने राजनीति को सामाजिक शक्ति का खेल बताया।
ख. आधुनिक चरण (Modern Stage): द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अमेरिका में 'व्यवहारवादी क्रांति' (Behavioral Revolution) के कारण इस विषय का तेजी से विकास हुआ। विद्वानों ने संस्थाओं के बजाय इंसानी व्यवहार का अध्ययन शुरू किया।
ग. समकालीन चरण (Contemporary Stage): आज के समय में यह विषय वैश्वीकरण, नागरिक समाज (Civil Society), और पहचान की राजनीति (Identity Politics) जैसे नए विषयों को अपने अंदर समेटे हुए है।
3. विकास की प्रमुख अवधारणाएँ (Key Concepts)
- सामाजिक आधार: यह मानना कि राजनीति हमेशा सामाजिक नींव पर टिकी होती है।
- लोकतंत्र का समाजशास्त्र: यह अध्ययन करना कि समाज की विविधता के बीच लोकतंत्र कैसे काम करता है।
- सत्ता का विकेंद्रीकरण: शक्ति केवल सरकार में नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न समूहों में कैसे बंटी है, इसका विकास हुआ।
- राजनीतिक भागीदारी: आम जनता का राजनीति के प्रति जुड़ाव बढ़ना इसके विकास का एक बड़ा कारण रहा।
निष्कर्ष: राजनीतिक समाजशास्त्र का उद्भव समाज को राजनीति के केंद्र में लाने के लिए हुआ। आज यह विषय राज्य और समाज के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में विकसित हो चुका है, जो सत्ता के सामाजिक आयामों की व्याख्या करता है।
1.4 राजनीतिक समाजशास्त्र का उद्भव और विकास (सरल व्याख्या)
राजनीतिक समाजशास्त्र का जन्म तब हुआ जब विद्वानों ने महसूस किया कि राजनीति को केवल 'कानून' और 'सरकार' के नजरिए से नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे 'समाज' के नजरिए से देखना जरूरी है। इसके विकास की कहानी को हम इन आसान बिंदुओं में समझ सकते हैं:
1. विषय की शुरुआत (शुरुआती दौर)
इस विषय की जड़ें यूरोपीय विचारकों के लेखों में मिलती हैं। 19वीं सदी में जब समाज में बड़े बदलाव आ रहे थे, तब विचारकों ने राजनीति और समाज के रिश्तों पर लिखना शुरू किया।
2. कार्ल मार्क्स का योगदान
मार्क्स ने सबसे पहले बताया कि राजनीति और सरकार असल में अमीर और गरीब वर्गों के बीच के संघर्ष का परिणाम हैं। उन्होंने राजनीति को 'आर्थिक आधार' से जोड़कर देखा।
3. मैक्स वेबर का प्रभाव
वेबर ने 'शक्ति' (Power), 'सत्ता' (Authority) और 'नौकरशाही' (Bureaucracy) के बारे में बताया। उन्होंने समझाया कि लोग नेता की बात क्यों मानते हैं और समाज में शक्ति कैसे बंटती है।
4. राजनीति विज्ञान की कमी
पुराना राजनीति विज्ञान केवल राजाओं और संविधान की बात करता था। विकास के क्रम में यह महसूस किया गया कि वोट देने वाला व्यक्ति (जो समाज का हिस्सा है) सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए यह नया विषय उभरा।
5. व्यवहारवादी क्रांति (1950 के बाद)
दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी विद्वानों ने इंसानों के राजनीतिक व्यवहार (जैसे वोट देना, रैलियां करना) पर रिसर्च शुरू की। इससे राजनीतिक समाजशास्त्र एक मजबूत विषय बन गया।
6. आधुनिक विकास
आज के समय में यह विषय केवल सरकार तक सीमित नहीं है। अब इसमें जाति, धर्म, सोशल मीडिया और आंदोलनों का राजनीति पर क्या असर पड़ता है, इसका गहराई से अध्ययन किया जाता है।
विकास के मुख्य कारण (Summary)
| कारण | सरल मतलब |
|---|---|
| सामाजिक परिवर्तन | समाज बदला तो राजनीति समझने के तरीके भी बदले। |
| नया नजरिया | संविधान के बजाय 'आम आदमी' के व्यवहार पर ध्यान दिया गया। |
| विद्वानों की खोज | मार्क्स और वेबर जैसे लोगों ने नई थ्योरी दीं। |
निष्कर्ष: राजनीतिक समाजशास्त्र का विकास एक ऐसी जरूरत के रूप में हुआ जिसने राजनीति को बंद कमरों से निकालकर समाज की गलियों और लोगों के विचारों तक पहुँचाया।
